T-33/29 उसपे ख़ुद को निसार करना था. द्विजेन्द्र द्विज

उसपे ख़ुद को निसार करना था
इश्क़ क्या बार-बार करना था?

अपना यूँ कारोबार करना था
ख़ुद को इक इश्तिहार करना था

ज़ीस्त को पुर-बहार करना
हश्र तक इन्तज़ार करना था

ग़म अता थी तो उसमें लुत्फ़ आता
यह भी परवरदिगार करना था

उससे हम इल्तिजा भी क्या करते
खु़द को ही शर्मसार करना था

पल रही थी भले ही दिल में ख़िज़ाँ
हमको ज़िक्रे-बहार करना था

ज़िन्दगी तुझसे क्या उलझते हम
खु़द को ही दरकिनार करना था

चाक अपना गिरेबाँ कर तो लिया
क्या इसे तार-तार करना था?

ख़ाहिशों की थी क्या बिसात आख़िर
अपने दिल को मज़ार करना था

खु़द से ख़ुद तक पहुँचना हो मुश्किल
इतना ऊँचा वक़ार करना था

क्या सुनाते उसे हम अपना हाल
क्या उसे अश्कबार करना था?

दिल यहीं रम गया था लेकिन फिर
हमको यह दश्त पार करना था

द्विजेन्द्र द्विज
09418465008

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T-17/21 पहले कभी ये हादिसा पेशे-नज़र न था-द्विजेन्द्र द्विज

दोस्तो!
वेब पत्रिका लफ़्ज़ के तरही मुशायरे में मेरी कोशिश:

पहले कभी ये हादिसा पेशे-नज़र न था
वक़्ते-सहर था दोस्तो ! नूरे-सहर न था

उन पे कभी कहीं भी मुझे कोई डर न था
जिन रास्तों पे कोई मिरा हमसफ़र न था

ले दे बस हमारा जुनूँ था हमारे साथ
इसके सिवा कुछ और तो रख़्ते-सफ़र न था

हम जुस्तजू में उसकी तमाशा तो बन गये
दीदावरों की भीड़ में वो दीदावर न था

उसकी गली पे हम तो दिलो-जाँ से थे निसार
‘उसकी गली से फिर भी हमारा गुज़र न था’

दस्ते-करम पे सदक़े तुम्हारे ऐ चारागर !
गहरा तो इस क़दर मिरा ज़ख़्मे-जिगर न था

बस रहनुमा पे उँगली उठाने की देर थी
पहले हमारा रास्ता यूँ पुरख़तर न था

बाहर से हमने ख़ुद को पुकारा जो बार-बार
अन्दर हमारे नाम का कोई बशर न था

देखा जो अपनी आँखों में आँखों को डाल कर
अक्सर हमारे काँधों पे अपना ही सर न था

क्यों फिर वहीं उम्मीद…

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बेशक बचा हुआ कोई भी उसका पर न था-द्विजेन्द्र द्विज

दोस्तो, ये ग़ज़ल तरह निकालने से पहले कही गयी थी इस लिये इसे तरह में तो नहीं माना जा सकता मगर म़जा तो लिया ही जा सकता है. सो द्विजेंद्र द्विज कि इस ग़ज़ल का म़जा लीजिये.

बेशक बचा हुआ कोई भी उसका पर न था
हिम्मत थी हौसला था परिन्दे को डर न था

धड़ से कटा के घूमते हैं आज हम जिसे
झुकता कभी ये झूठ के पैरों पे सर न था

कदमों की धूल चाट के छूना था आसमान
यूँ सब हुनर थे हममें मगर ये हुनर न था

भूला सहर का शाम को लौटा तो था मगर
जाता कहाँ वो घर में कभी मुन्तज़र न था

सूरज का एहतराम किया उसने उम्र भर
जिसका कहीं भी धूप की बस्ती में घर न था

उसने हमें मिटाने को माँगी ज़रूर थी
यह और बात है कि दुआ में असर न था

अपना सफ़र तमाम हुआ उस मुकाम…

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T-10/13 पहले धूप ओस में नहाती है-द्विजेन्द्र द्विज

पहले धूप ओस में नहाती है
फिर पहाड़ों पे खिलखिलाती है

जुर्म की पीठ थपथपाती है
तब सियासत सुकून पाती है

वो बहुत खुशनसीब होते हैं
जिन पहाड़ों पे धूप आती है

ता-सहर नौकरी बजाते हैं
कब चराग़ों को नींद आती है

जब कभी देखता है आईना
वक़्त की आँख डबडबाती है

एक चिड़िया-सी तन के पिंजरे में
हर धमाके पे फड़फड़ाती है

एक दुनिया उजाड़ कर बेटी
एक दुनिया नई बसाती है

रोज़ दरवाज़े पर कोई आहट
दस्तकें दे के लौट जाती है

तीरगी बाज़ जब नहीं आती
एक बिजली-सी कौंध जाती है

वो जो लड़ते थे धूप की ख़ातिर
धूप अब उनपे तमतमाती है

हर जगह इल्म की नुमाइश में
मेरी दस्तार खुल ही जाती है

द्विजेन्द्र द्विज 09418465008

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T-10/10 आँख बाज़ार से जब आती है-द्विजेन्द्र ‘द्विज’

आँख बाज़ार से जब आती है
कितने मंज़र समेट लाती है

जो हवा बस्तियाँ जलाती है
कैसे ज़हनों से हो के आती है

तीरगी है कि रात-दिन खट कर
रोज़ सूरज नया उगाती है

माँ, मैं ख़ाबों से ख़ौफ़ खाता हूँ
क्यों मुझे लोरियाँ सुनाती है ?

रात-दिन जोड़ने घटाने में
कोई शय है जो छूट जाती है

मौत से आँख जो चुराते हैं
ज़िन्दगी उन से मुँह छुपाती है

एक हल्की-सी, नूर की आहट
रौशनी के क़रीब लाती है

देखकर हश्र बूढ़े पेड़ों का
इक दुआ लब पे थरथराती है

मेरी सूरत नहीं मिरी जब से
‘इश्तिहारों के काम आती है’

रोज़ बाज़ार में नई हसरत
क्यों मिरा ज़ब्त आज़माती है

बादशाहत करे जो हर दिल पर
वो ज़बान आते-आते आती है

एक फ़ितरत है बेतमीज़ी भी
साथ आती है साथ जाती है

मैं भी रँगने लगा हूँ बालों को
वो भी अब झुर्रियाँ छुपाती है

फौज यादों की…

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T-8/12 फ़ज़ा लबरेज़ है जिस नग़्मगी से-द्विजेन्द्र ‘द्विज’

फ़ज़ा लबरेज़ है जिस नग़्मगी से
वो आयी है ग़ज़ल की बाँसुरी से

बचाओ ज़ह्नो-दिल की बेकली से
‘मैं आजिज़ आ गया हूँ शाइरी से’

हमें चेहरों से कोई ख़ौफ़ कब था
हमारी जंग थी बेचेहरगी से

यहाँ भी मुन्तज़िर कोई नहीं है
मिला ये क्या मुझे घर वापसी से

निकालो तुम भी अपने दिल की हसरत
बुझा लो प्यास मेरी तिश्नगी से

मिरे मौला! मुझे तौफ़ीक़ देना
गुज़रना चाहता हूँ उस गली से

दिखाया एक दुनिया का नज़ारा
कोई शिकवा नहीं आवारगी से

ये क्या है रोज़ का मर-मर के जीना
अमां कुछ काम लीजे ज़िन्दगी से

फ़क़त सर को क़लम होना है बाक़ी
मिला सब कुछ है वरना सरकशी से

खुदा महफ़ूज़ है वो है जहाँ भी
बचाओ आदमी को आदमी से

तो क्या मैं भी सियासी हो चला हूँ
मेरी बनने लगी अब हर किसी से

मैं अब ख़ुद में सिमट कर रह गया हूँ
सबक़ सीखा…

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तपते सहराओं का इक लम्बा सफ़र मेरा भी है
फिर भी ज़िन्दा है जुनूँ तो राहबर मेरा भी है

गो ज़मीं पर एक वक़्फ़ा मुख़्तसर मेरा भी है
रह न जाऊँ मैं यहीं बस एक डर मेरा भी

तू मेरे चेह्रे में गुम है मैं तेरे चेह्रे में गुम
ख़ुदफ़रेबी का यही तेरा हुनर, मेरा भी है

सर उठाकर शान से चींटी ने पर्वत से कहा,
‘आसमाँ इक चाहिये मुझको कि सर मेरा भी है

हर तरफ़ फैली हुई हैं ख़ौफ़ की सरदारियाँ
रास्ता तेरा अगर है पुरख़तर, मेरा भी है

चाँद है तू बादशाही शब पे है तेरी मगर
मैं हूँ सूरज एक अन्दाज़े-सहर मेरा भी है

अब तो हमसाये को हमसाये का साया भी हराम
मैं भी उससे डर रहा हूँ उसको डर मेरा भी है

अपनी वहशत में जिसे कल राख कर आया हूँ मैं
मैंने कब सोचा उसी बस्ती में घर मेरा भी है

अब तो है काई…

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